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यूपी कैबिनेट में मंत्री असीम अरुण ने नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, कहा..ब्यूरोक्रेसी का मौजूदा मॉडल बेअसर

समाज कल्याण मंत्री असीम अरूण ने ब्यूराक्रेसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लिए स्टील फ्रेम नहीं कार्बन फाइबर की जरूरत है।

Gaurav Dwivedi
July 19, 2026
3 min read
यूपी कैबिनेट में मंत्री असीम अरुण ने नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, कहा..ब्यूरोक्रेसी का मौजूदा मॉडल बेअसर

लखनऊ: उच्च शिक्षा में स्कूटी योजना की नीति पर ब्यूरोक्रेसी से राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की नाराजगी के बाद अब समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि नौकरशाही के उस प्रसिद्ध ‘स्टील फ्रेम’ पर गंभीरता से पुनर्विचार करें, जिसे कभी प्रशासन की रीढ़ माना गया था। उन्होंने कहा कि विकसित भारत की आकांक्षाओं के लिए लचीले कार्बन फाइबर की जरूरत है।

मंत्री ने फेसबुक पर पोस्ट लिख उठाए सवाल

असीम अरुण ने रविवार को फेसबुक पर लंबी पोस्ट की है। इसमें उन्होंने लिखा है कि जब तक सरकारी नीतियां सिर्फ फाइलों और कागजों में खूबसूरत दिखेंगी और जमीन पर लागू होने लायक नहीं होंगी, तब तक लोक कल्याण का वास्तविक उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा। नीति निर्माण में व्यावहारिकता का यह अभाव प्रशासनिक मशीनरी की सबसे बड़ी कमजोरी है। और इसका हल केवल आलोचना करने में नहीं है, बल्कि समस्या की जड़ तक जाकर पूरे 'सिस्टम' को बदलने में है।

स्टार अधिकारी नहीं, मजबूत सिस्टम

मंत्री ने कहा कि यह सोचना होगा कि ‘स्टील फ्रेम’ में निष्पक्षता और ईमानदारी को सुरक्षित रखने वाले तंत्र प्रभावी हैं? क्या इसमें योग्य प्रतिभाओं को हम ला पा रहे हैं? आदर्श नौकरशाही की पहचान कुछ स्टार अधिकारियों से नहीं, बल्कि मजबूत सिस्टम से होती है। चुनाव प्रबंधन और आपदा प्रबंधन इसका उदाहरण है जहां सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि लाखों कर्मियों के सामूहिक प्रयास को मिलता है। लेकिन जमीन की खरीद-फरोख्त, यातायात प्रबंधन, हाउस टैक्स संग्रह, नगर बसावट, आदि अनेक क्षेत्रों में सिस्टम आज भी कमजोर है।

योग्यता न उत्कृष्टता, परिणाम कैसे आएगा

आईपीएस से वीआरएस लेकर राजनीति में आए असीम अरुण ने UPSC भर्ती प्रक्रिया को भी कटघटरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि यूपीएससी के जरिए विभिन्न सेवाओं के अफसर चुने जाते हैं। विदेश सेवा के लिए चुने जाने वाला न राजनीतिशास्त्र पढ़ा होता है और न ही कोई विदेशी भाषा। आईएएस को छोड़कर अधिकांश अभ्यर्थी उस सेवा में जाने का लक्ष्य लेकर नहीं आते, जिसमें उन्हें नियुक्त किया जाता है। जब न योग्यता हो‌ और न रुचि, तो उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां विकसित करने की जरूरत

इसी तरह स्वास्थ्य, नगर प्रशासन, पुलिस अधिकारियों के चयन में विशेषज्ञता को कोई प्रोत्साहन नहीं है। इस स्थिति को बदलने के लिए आवश्यक है कि विभिन्न सेवाओं जैसे विदेश सेवा, राजस्व, पुलिस के लिए अलग-अलग परीक्षा प्रणालियां विकसित की जाएं। यूपी में हास्पिटैलिटी क्षेत्र से व्यवस्था अधिकारी, मीडिया ग्रेजुएट को सूचना अधिकारी और माइनिंग ग्रेजुएट को खनन अधिकारी बनाने के उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। इसे आगे बढ़ाना होगा।

लैटरल एंट्री और एग्जिट जरूरी

मंत्री ने पोस्टिंग पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अक्सर इसमें योग्यता या रुचि का ध्यान नहीं रखा जाता। इसके विपरीत, भारतीय राजस्व सेवा में एक व्यवस्थित, विकल्प-आधारित प्रणाली देखने को मिलती है। प्रदेश के शिक्षा विभाग ने भी ‘चॉइस-कम-मेरिट’ मॉडल अपनाया है। इसी तरह हेल्थ में डाक्टरों को, वन मंत्रालय में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों, शिक्षकों को शिक्षा मंत्रालय में और वित्तीय विशेषज्ञों को वित्त मंत्रालय में नियुक्त करें तो बेहतर परिणाम आएंगे।

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