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पूरी दिल्ली से बैरिकेड्स हटाएं, इंटरनेट और मेट्रो स्टेशन चालू रखें… सुप्रीम कोर्ट का अवमानना मामले पर कारण बताओ नोटिस जारी

सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली प्रोटेस्ट से जुड़े अवमानना मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को शो कॉज नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने सरकार को जवाब तलब करने के लिए 13 अक्टूबर मंगलवार तक जवाब मांगा है.

Gaurav Dwivedi
October 11, 2026
5 min read
पूरी दिल्ली से बैरिकेड्स हटाएं, इंटरनेट और मेट्रो स्टेशन चालू रखें… सुप्रीम कोर्ट का अवमानना मामले पर कारण बताओ नोटिस जारी

दिल्ली प्रोटेस्ट मामले में कोर्ट की अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को सम्बद्ध किया. कोर्ट ने कहा, हम संबंधित प्राधिकारों को अपना 9 अक्टूबर का आदेश याद दिलाते हैं. इसमें मेट्रो ट्रेन को अचानक ना बंद करने और लोगों की आवाजाही को बाधित ना करने को कहा गया था. संबंधित प्राधिकार इस पर जवाब दें कि उनके खिलाफ अवमानना का मामला क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए. अदालत के आदेश का खुलेआम अवहेलना के मद्देनजर हम सरकार से जवाब तलब कर रहे हैं. कोर्ट ने शो कॉज नोटिस जारी किया है और मंगलवार तक जवाब मांगा है.सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत मेट्रो का नियमित संचालन जारी रखने का आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि दिल्ली से बैरिकेड्स हटाए जाएं. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट सेवा बहाल करने का भी निर्देश दिया. 163 लागू करने की सूचना ना दिये जाने पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह सूचना व्यक्तिगत तौर पर नहीं दी जाती.

जस्टिस बागची ने कहा कि पहले हम एसजी तुषार मेहता को सुना. पूर्व अटॉर्नी जनरल वेणुगेपाल भी एक याचिकाकर्ता की ओर से ऑनलाइन जुड़े. सुनवाई के दौरान पूर्व अटॉर्नी जनरल वेणुगेपाल भी एक याचिकाकर्ता की ओर से ऑनलाइन जुड़े. जस्टिस बागची ने कहा कि इस संबंध में जो नई याचिकाएं दायर हुई हैं. उनको हम सोमवार को यानी कल सुनेंगे. जस्टिस बागची ने कहा कि इस संबंध में जो नई याचिकाएं दायर हुई हैं. उनको हम सोमवार को यानी कल सुनेंगे. सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट का विशेष सुनवाई के लिए आभार जताया. जस्टिस बागची ने कहा कि हम हमेशा देश की सेवा के लिए प्रस्तुत हैं.

‘कल दिल्ली में लोगों को खड़े होने की अनुमति नहीं थी’

एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि दिल्ली में कल कहीं लोगों को खड़े होने की अनुमति नहीं थी. नागरिकों का अधिकार है उसका खुलेआम उल्लंघन हुआ और इस पर अदालत को कड़ा आदेश देना चाहिए.

जस्टिस बागची ने वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल से पूछा, क्या आप अवमानना ​​का नोटिस जारी करवाना चाहते हैं? हमारे पास ऐसी ही राहत के लिए पहले से एक याचिका है.हम आपके मामले को सोमवार को लिस्ट करने का प्रस्ताव रखते हैं. वेणुगोपाल ने कहा कि कृपया नोटिस जारी करें.

जस्टिस बागची ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल की बात सुनने के बाद हम उस पर विचार करेंगे. आप चाहते हैं कि जवाब आए और मामला लिस्ट हो. सुप्रीम कोर्ट ने कहा हम 2 विकल्प दे सकते हैं – एक, हम इसे सोमवार को नए मामले के तौर पर लिस्ट करें, या जब हम दूसरे लिस्टेड मामलों की सुनवाई करें. तो आपके मामले को भी उनके साथ जोड़ दें.

धन्यवाद की बात नहीं, हम देश सेवा में हाजिर हैं

वेणुगोपाल ने कहा कि कृपया नोटिस जारी करें. उन्हें सोमवार को जवाब दाखिल करने दें. सिब्बल ने कहा कि अवमानना ​​से कहीं बड़े मुद्दे हैं. इस सुनवाई के लिए हम आपका धन्यवाद करते हैं. जस्टिस बागची ने कहा कि धन्यवाद की कोई बात नहीं है. हम हमेशा देश की सेवा में हाजिर हैं.

‘ये सिर्फ ‘उचित कार्रवाई’ का सवाल नहीं’

वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मैंने जो कुछ भी सौंपा है, वह पेनड्राइव में है, इसमें वीडियो के स्क्रीन-ग्रैब हैं. वकीलों के खिलाफ कार्रवाई की गई. शादान समेत कई लोगों को हिरासत में लिया गया. ये सब जंतर-मंतर के दायरे से काफी बाहर हुआ. अभी भी सुप्रीम कोर्ट के बाहर धारा 163 लागू है. मीडिया में भी इसकी रिपोर्ट आई है. यह चौंकाने वाला है. जिस तरह की हिंसा हो रही है, ये सिर्फ ‘उचित कार्रवाई’ का सवाल नहीं है. सबसे पहले तो ज़रूरत देखी जानी चाहिए. निहत्थे बच्चों को पीटना, लात मारना. उनके साथ बिना वजह हाथापाई करना. हमें कई वीडियो मिल रहे हैं. ये लोग इसे बहादुरी की निशानी मानते हैं. इस घटना ने हम सबके मन में कई भावनाएं जगा दी हैं. ये मामला अब हमारे दरवाजे तक आ पहुंचा है.

वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि हम कुछ लॉयर्स कल सीतलवाड चेंबर से रेड लाइट की तरफ पहुंचे वहां पुलिस ने हमें घेर लिया और मुझे एक महिला पुलिस ने तेजी से खींचा. हम पूरी तरह से शांत थे. एक वकील ने कहा कि यह मामला मूल अधिकार अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है. वकील ने कहा कि लोगों को दिल्ली के बॉर्डर या फिर गुड़गांव समेत अन्य स्थानों से हिरासत में लिया गया. करीब 6-7 हजार लोग हिरासत में लिए गए. जस्टिस बागची ने कहा कि हम जानते हैं और इसकी गंभीरता को भी समझते हैं. जस्टिस बागची ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर कानून वयवस्था कायम करने का अधिकार नहीं होता जबतक कि राज्य प्रशासन की ओर से निर्णय ना लिया जाए. जस्टिस बागची ने कहा कि आप सभी चिंता ना करें लोगों के जीवन और स्वतंत्रता के मुद्दे पर हम इस मामले की तह तक जाएंगे और पूरा मामला सुनकर आदेश देंगे.

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