जब स्कूल का हिसाब आज भी रजिस्टर में चलता है, तब डिजिटल होने का मतलब क्या है?
छोटे शहरों के स्कूलों में आज भी फीस का हिसाब-किताब कई जगह रजिस्टर, calculator और हाथ से बनी receipts के सहारे चलता है। VidhyaPe इसी ground reality से निकली एक कोशिश है—ऐसी technology बनाने की, जिसे वर्षों से register पर काम कर रहा accountant भी बिना झिझक अपना सके।

छोटे शहरों के स्कूलों और वर्षों से रजिस्टर पर काम कर रहे अकाउंटेंट्स को ध्यान में रखकर VidhyaPe बनाने की कहानी
लखनऊ।
स्कूल की सुबह शुरू हो चुकी है।
बच्चे अपनी कक्षाओं में जा चुके हैं। शिक्षक पढ़ाने में व्यस्त हैं। प्रिंसिपल दिनभर के काम में लग चुके हैं।
लेकिन स्कूल के एक कोने में एक अलग दुनिया चल रही है।
एक मेज पर मोटा-सा रजिस्टर खुला है। उसके पास calculator रखा है। कुछ receipts हैं, एक pen है और फीस जमा करने वाले बच्चों की सूची।
स्कूल का accountant एक-एक entry देख रहा है।
किसकी फीस जमा हुई?
किसकी बाकी है?
किसकी receipt बननी है?
किसका हिसाब मिलाना है?
और फिर दिन के अंत में वही numbers दोबारा check करने हैं।
भारत के बड़े शहरों में education technology तेजी से बदल रही है। लेकिन छोटे शहरों और कस्बों के बहुत से स्कूलों में आज भी रोजमर्रा का financial और fee management काफी हद तक इन्हीं पारंपरिक तरीकों पर निर्भर है।
यह किसी एक स्कूल की कहानी नहीं है।
यह उस भारत की तस्वीर है, जहां digital transformation की जरूरत तो है, लेकिन technology तक पहुंच और उसे आसानी से अपनाने के बीच अभी भी एक बड़ा gap मौजूद है।
सवाल software का नहीं, इस्तेमाल का है
यही सवाल VidhyaPe की शुरुआत का कारण बना।
VidhyaPe के पीछे सोच रखने वाले Nishant Mishra कहते हैं कि सवाल यह नहीं था कि schools के लिए एक और software क्यों बनाया जाए।
सवाल यह था—
“क्या ऐसी technology बनाई जा सकती है, जिसे वह accountant भी आसानी से इस्तेमाल कर सके, जो पिछले 10–15 साल से register पर काम कर रहा है?”
यह सवाल सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन education technology की दुनिया में इसका मतलब काफी बड़ा है।
क्योंकि technology बनाने और technology को जमीन पर अपनाए जाने के बीच काफी अंतर है।
एक software में कितने features हैं, यह महत्वपूर्ण है।
लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है—
क्या वह software उस व्यक्ति के लिए आसान है, जो रोज उसे इस्तेमाल करेगा?
Technology को लोगों के हिसाब से क्यों न बनाया जाए?
Digitalisation की चर्चा में अक्सर यह मान लिया जाता है कि लोगों को technology के हिसाब से बदलना होगा।
लेकिन Nishant Mishra की सोच कुछ अलग है।
उनके मुताबिक, technology को ही इतना सरल बनाया जाना चाहिए कि लोगों को लगे कि उनका काम बदला नहीं है—सिर्फ उसका तरीका आसान हुआ है।
“हम यह नहीं कह सकते कि आप इतने साल से register पर काम कर रहे थे, अब digital हो जाइए। सवाल यह होना चाहिए कि technology को इतना आसान कैसे बनाया जाए कि accountant खुद कहे—हाँ, मैं इसे इस्तेमाल कर सकता हूं।”
यही विचार VidhyaPe के पीछे दिखाई देता है।
रजिस्टर में होने वाली entry को digital करना।
Calculator पर होने वाली calculations को आसान बनाना।
हाथ से receipt बनाने की जरूरत कम करना।
और रोज के हिसाब-किताब और reports को ज्यादा आसानी से उपलब्ध कराना।
उद्देश्य सिर्फ पुराने तरीके को software से बदलना नहीं है।
उद्देश्य है उसी काम को कम मेहनत और कम समय में करना।
Tier-2 और Tier-3 शहरों की अपनी digital reality है
भारत का digital India सिर्फ Delhi, Mumbai या Bengaluru में नहीं बसता।
Lucknow, Kanpur, Sitapur, Gorakhpur, Bareilly, Prayagraj और देश के हजारों छोटे शहरों और कस्बों में भी लाखों लोग रोज technology का इस्तेमाल कर रहे हैं।
लेकिन हर जगह technology अपनाने की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं।
कई छोटे और मध्यम स्कूलों में dedicated IT teams नहीं हैं।
कई जगह technology को लेकर training और support की जरूरत होती है।
और कई बार सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि software कितना advanced है।
सवाल यह होता है—
“क्या इसे हमारा accountant चला पाएगा?”
यही वह जगह है जहां सरलता सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि technology की जरूरत बन जाती है।
Digital transformation की असली परीक्षा
किसी school को software दे देना digital transformation नहीं है।
Digital transformation तब है जब technology की वजह से रोज का काम सचमुच आसान हो।
जब accountant को बार-बार वही calculations न करनी पड़ें।
जब principal को जरूरी जानकारी के लिए files और registers ढूंढने की जरूरत कम हो।
जब school management को अपने numbers और collections की बेहतर visibility मिले।
और जब technology इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को यह न लगे कि software उसके काम को और मुश्किल बना रहा है।
Nishant Mishra के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
“हम features गिन सकते हैं—dashboard, reports, automation, notifications। लेकिन मेरे लिए एक सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण है—क्या accountant इसे बिना किसी डर के इस्तेमाल कर सकता है?”
अगर जवाब हां है, तो वही सबसे बड़ा feature है।
एक accountant की मेज से शुरू होने वाला बदलाव
शायद technology की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह किसी बड़ी समस्या को हल करने के बजाय हजारों छोटी परेशानियों को खत्म कर दे।
एक receipt बनाने में लगने वाला अतिरिक्त समय।
एक calculation को दोबारा check करने की जरूरत।
एक pending fee ढूंढने में लगने वाले कुछ मिनट।
एक report तैयार करने में लगने वाला पूरा घंटा।
अलग-अलग देखें तो ये छोटी चीजें लग सकती हैं।
लेकिन जब यही काम हर दिन, हर महीने और पूरे academic session में दोहराया जाता है, तो इनका असर बड़ा होता है।
इसीलिए VidhyaPe की कहानी सिर्फ software की कहानी नहीं है।
यह उस accountant के समय की कहानी भी है।
उसकी सुविधा की कहानी भी है।
और उस भरोसे की कहानी भी है, जो किसी भी technology को अपनाने के लिए जरूरी होता है।
हमारी सबसे बड़ी सफलता क्या होगी?
VidhyaPe के लिए सफलता का मतलब सिर्फ users की संख्या, revenue या कोई बड़ा award नहीं है।
सफलता शायद उस दिन होगी जब कोई accountant, जिसने वर्षों तक register पर काम किया है, पहली बार digital system इस्तेमाल करे और उसे देखकर कहे—
“अरे… ये तो आसान है।”
क्योंकि technology का असली उद्देश्य लोगों को technology expert बनाना नहीं होना चाहिए।
उसका उद्देश्य उनका काम आसान करना होना चाहिए।
भारत में digital transformation तभी पूरी तरह सफल होगा, जब technology बड़े शहरों के sophisticated offices से निकलकर छोटे शहरों के उन offices और classrooms तक पहुंचे, जहां आज भी बहुत-सा काम registers में दर्ज होता है।
और शायद VidhyaPe की कोशिश इसी दिशा में एक छोटी-सी शुरुआत है।
Register से digital screen तक की नहीं।
बल्कि उस इंसान के काम को थोड़ा आसान बनाने की, जो हर दिन स्कूल को चलाने में अपनी भूमिका निभाता है।
— Nishant Mishra
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