भारत में 100 बड़ी ग्लेशियल झीलों की निगरानी, इस राज्य में बढ़ रहा बड़ा खतरा; 34 में जलस्तर बढ़ा
नेपाल में हाल की आपदा के साथ-साथ भारत के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं। हिमाचल प्रदेश और तिब्बत में इन झीलों के बढ़ने से निचले क्षेत्रों में खतरा बढ़ सकता है। केंद्र सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल आयोग 100 बड़ी ग्लेशियल झीलों की जल क्षेत्र की निगरानी कर रहा है।

नई दिल्लीः नेपाल में हालिया आपदा और ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरे के बीच भारत के हिमालयी क्षेत्र को लेकर भी चिंता बढ़ गई है। हिमाचल प्रदेश और तिब्बत में ग्लेशियल झीलों के बढ़ने और इनके फटने की स्थिति में नीचे की ओर रहने ढांचे पर खतरा बढ़ सकता है। केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल आयोग 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली 100 बड़ी ग्लेशियल झीलों के जल क्षेत्र की लगातार निगरानी कर रहा है।
इनके क्षेत्रफल में बदलाव के ट्रेंड और संभावित जोखिम का आकलन किया जा रहा है। इनमें से 34 का जल क्षेत्र बढ़ता मिला है। हिमाचल प्रदेश की 10 झीलों में से 6 के क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि सिक्किम की 42 झीलों में 15 का क्षेत्रफल बढ़ता पाया गया।
बहाव क्षेत्र की भी मैपिंग
एनजीटी में सबमिट एक रिपोर्ट में केंद्र सरकार ने बताया कि ग्लेशियल झीलों के जोखिम का आकलन केवल झील की स्थिति देखकर नहीं किया जा रहा है। झील के संभावित आउटफ्लो के रास्ते में आने वाली आबादी, बांध, बिजली परियोजनाओं, पुलों और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाओं को भी मैप किया जा रहा है। यानी किसी झील के बढ़ने का खतरा उस समय और गंभीर हो जाता है, जब उसके संभावित बहाव के रास्ते में बड़ी आबादी या महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर हो।
क्रायोस्फीयर में बदलाव का अध्ययन
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, रुड़की में सेंटर फॉर क्रायोस्फीयर एंड क्लाइमेट चेंज स्टडीज स्थापित किया गया है। इसका उद्देश्य बर्फ, हिम और ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों, जलवायु परिवर्तन के साथ उनके संबंधों का अध्ययन करना है। यहां उत्तराखंड के गंगोत्री, मिलम और खटलिंग, हिमाचल के त्रिलोकी ग्लेशियर का अध्ययन किया जा रहा है
अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का परीक्षणः 2026 में एनडीएमए ने हिमाचल प्रदेश के सिस्सू में स्वदेशी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड अर्ली वॉर्निंग सिस्टम का परीक्षण किया है। मार्च 2026 में यहां इस सिस्टम का प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट ऑपरेशनल किया गया था। हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी तकनीक के विस्तार की दिशा में काम हो रहा है।
झील बढ़ी तो सिर्फ पानी का खतरा नहीं
ग्लेशियल झीलों के बढ़ने का खतरा केवल उनके जल क्षेत्र के विस्तार तक सीमित नहीं है। अगर झील को रोकने वाला प्राकृतिक बांध कमजोर होता है या अचानक टूटता है तो बड़ी मात्रा में पानी के साथ बर्फ, चट्टान, तलछट और मलबा नीचे की ओर तेजी से पहुंच सकता है। इससे नदी घाटी में बसे गांवों के अलावा सड़क, पुल, बिजली परियोजनाओ और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान हो सकता है। हिमालय में तापमान बढ़ने, ग्लेशियरों के पीछे हटने की पृष्ठभूमि में कई जगह पानी जमा होकर झीले बन रही है।
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